भुलक्ड्ड से भूल हो चली,

तो किस्मत बाबा के पास गया,

हथेली दिखाई और त्रास गया,

कल तक तो फटकार थी मकान मालिक की,

अब बीवी से भी आना कानी कर हार गया,

बड़ी दुखमयी हो चली रीत यहां,

कल भुलक्कड़ से हो गई क्या भूल कहां?

सर खुजलाया , नाक सिकोड़ी,

तन बदन को भी आराम दिलाया,

फिर थाली में लेकर आम चटनी,

बीवी को अपने पास बुलाया,

खुदके हाथ से एक कौर खिलाया,

चर्चा करी जीवन घर बार की,

खुले मन से उसको बतलाया,

जीवन ने भुलक्कड़ को बस यही सिखलाया,

थोड़ा हंसने से हो सकता गम का सफाया,

याद आया तो जमकर हंसी से दोनों को ठहाका आया,

हाथ धोया और शांति से रेडियो पर एक गीत चलाया,

विविध भारती ने भुलक्कड़ की फरमाइश को ना झुठलाया,

उसके मनपसंद का गीत बजाया,

अब रीत दुख की खत्म हो गई,

सुर में सरल सुख की अनुभूति हो गई।

अरे भूलो की भुलक्कड़ से भी कोई भूल हो गई!


- यति



धन्यवाद :)