भीतर से भावुक,
रोष थोड़ा स्वाभाविक!
किंतु अपनों संग तुम बात करो,
नज़र के धोखे के समक्ष न डरो,
हां, मन को तुम साफ करो,
कल्पना करो सुखद होगा ये जग!
ना चिंतित हो क्या सोचेंगे लोग पग-पग,
विडंबना में समीक्षक की राय परख लो,
चाहो तो एकांत में आत्म मंथन कर लो,
तुम स्वभाव में लाओ लचीलता,
तभी तो उसूलों भरे रिश्तों में जचेंगी शालीनता,
भय क्रोध को दूर मिटाओ,
चेतना को अपने कर्तव्यों में समाओ,
खुशियों के लम्हों को निरंतर दुगना होते पाओ!
-यति
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