मैं विषम परिस्थितियों से नहीं मिली,

वो तो सफर में संग आ चली,

हर ढ़ंग मेरी कोशिश का संवार गई,

कठिनाई की परीक्षा में किन्तु कोई औसत नहीं!

मुझे अनुभवों से ये जो दौलत मिली,

वही तो अवचेतन मन की जड़ी,

अब खुदसे रूठें इतनी कभी कोई बात ना बड़ी!

बचपन में जादू की छड़ी लेने को मां से लड़ी,

दिखला देती थी फिर भी लोरी से वो अपनी जादूगरी,

कैसी उनके हौसले में थी करिश्माई ताकत भरी,

हंसती इठलाकर , मैं कैसे रही थी मुंह फुलाकर?

आंखो में झलकता था उनके अतह जुनून,

मुझ पर अपने प्रेम से कैसे रख पाती थी वो नज़र कड़ी?

लगता था मानो अपनी छोड़ उनको सबकी पड़ी।



- यति