संबोधन में सुरीला ज़िक्र आए,

कहो आज के दिन कौनसे गीत तुम गुनगुनाएं?

प्रतिक्रिया से पहल ही एक रोचक ख़ुशी मिल जाएं,

ऐसा मुझ पर कौनसा मनोहर इंद्रजाल बिछाए?

अनूठा सा दिल को वजूद मिल जाए,

अब वक़्त-बे-वक़्त तुम्हारी फ़िक्र सताए,

क्या उमंग का ज़िक्र शब्दों में हम कर पाएं?

एहसास जो उमड़े वो सहजता से व्यक्त कर जाएं,

श्वास थमते ही आनंद स्वत: मेरे मुख पर झिलमिलाएं,

क्यूं साथ विकसित होने की मंशा रूह जगाए?

क्या मैं में "मैं" को भूल हम होने की कामना यूंही मुझे तरसाए?

या कहो की तुम मुझे हर तकलीफ़ से रखना चाहते पराए?

अनोखी शाम में भी मुझे सूर्योदय संग उदय होने की पहल मिल जाए,

क्या ये मीठी तड़प यूंही इतनी कड़क ?

या मुझे तुम्हारे संग जाना वो लम्बी सुकून वाली सड़क,

जहां फूल हो बिखरे,

स्वर सांसों का गूंजे,

जहां चेतना के उजाले में जिस्म निखरे,

भूल कर हम कुछ पल समाज की फिक्रे,

आत्मा से आत्मा की पहल को भला क्यूं रोकें?

संबोधन में सुरीला ज़िक्र आए,

प्रतिक्रिया से पहल ही एक रोचक ख़ुशी मिल जाएं!


- यति