अतीत में व्यतीत उन लम्हों को,
दर्द को कम करते मरहमो को,
अतीत में ही रहने दो,
आज को कहो संवरने!
बीती सो बीती ,
आज की किन्तु यही नीति ,
रहे सिर्फ सुष्मना की कीर्ति,
व्यवहार में भी प्रज्वलित हो उसी की प्रीति,
क्षणिक सी नाराज़गी की ठेस,
ना कस्ती रहे यूंही तंज अनेक,
जो माफी को मन मान सके,
ना करना उसकी इच्छा से परहेज़,
मंशा ना हो मनुष्य की,
फिर भी हो जाता गलती से रिश्तों में फरेब,
ना समझो उसको स्नेह में कोई ऐब,
हो जाए गफलत में सिर्फ शांति का आवेश,
और मिट जाए सारे मन के द्वेष,
अतीत में व्यतीत उन लम्हों को,
दर्द को कम करते मरहमो को,
अतीत में ही रहने दो,
आज को कहो संवरने!
- यति


