राह के मुसाफिर ने स्वीकार ली सरलता,
तो विचारों से ओझिल हो उठी जटिलता!
याद आया सांसें गई थी मानो थम,
लहरों के समक्ष जब बैठे थे हम,
लहरें कभी धीमी कभी प्रगाढ़,
अतुल्य उत्सव मनाता हो जैसे आषाढ़!
प्रकृति के ये सहज परिवर्तन,
जीव को ना जकड़ते सदय प्रावधान,
रहना हैं बस गफलत से सावधान,
न भूलें की प्रकृति ने दिया हैं हमें वरदान,
अपनी दृष्टि को बनाएं ऊर्जस्वी,
गृहस्थ जीवन में भी रह पाएंगे फिर तेजस्वी,
जाने दीजिए समस्त विकार,
मन को खोलें हरेक प्रकार,
सपने समय संग होंगे साकार,
बशर्ते आप न रहे हों खुदको नकार!
अनुशासन लाता हमारे भीतर निर्मल निखार,
खामियों को भी हम रहें हो सहज स्वीकार,
कर्तव्य को शालीनता से हैं निभाना,
कला को मन ने निरंतर हैं लुभाना।
- यति
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