आशा टूटी,

उसकी प्रार्थना रूठी,

मुखातिब नहीं समझ,

जाए अब सजनी छोड़

किसके घर को बांटने

अपने भीतर छिपा द्वंद,

उसने निर्मित किए,

उजले सुंदर स्वप्न अनोखे,

कुछ वादें टूटे

जो थे भीतर से खोखले,

रात की रानी की रूमानी सुगंध

घोल महका रही मन,

स्वस्थ सोच

रूमानियत को महकाए,

कोई बहाना न सत्य से बहकाए,

उसने बहुत अनमोल

अपने संग संवरने को

रिश्ते दाओ पर लगाए,

पल भर भी मन ये न समझ पाए,

आखिर ज्योति प्रज्वलित रहें,

ये तो सरलता से ही मुमकिन हो पाए,

आशा की किरण!

कण कण में जिसका वर्णन,

विनाशकारी विचारों का विसर्जन,

जन जन में कला की अभिरुचि का उन्मूलन।


- यति