
संध्या में हो रही थी सपनों की समीक्षा,
वक़्त को मानो हो रही थी बीतने की प्रतीक्षा,
सामान्य सुविधा में ही करनी थी हुनर की रक्षा,
पूरी हो चुकी थी आखिर परंपरागत शिक्षा!
चरम पर था शबाब!
हवाओं में मौज़ूद था जादुई करिश्मा,
चाय लिए पुकार रहीं थी दूर खड़ी मेरी मां,
फिर चाय पीकर जकड़न गई थी सारी छूट,
वो अपनी करुणा की प्याली से जो लाई थी घूंट!
अतीत का दबाव,
बीती बातों से भले भीतर प्रज्ञा रूठी थी,
किन्तु कुंठित मन को कब कहां कुछ सूझी थी?
क्या फिर मुमकिन वास्तविकता में बातें रूहानी?
कल चिट्ठी खोली तो छलक गया था आंखो से पानी!
किस पर हो रहा था प्रभाव?
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