संध्या में हो रही थी सपनों की समीक्षा,
वक़्त को मानो हो रही थी बीतने की प्रतीक्षा,
सामान्य सुविधा में ही करनी थी हुनर की रक्षा,
पूरी हो चुकी थी आखिर परंपरागत शिक्षा!
चरम पर था शबाब!
हवाओं में मौज़ूद था जादुई करिश्मा,
चाय लिए पुकार रहीं थी दूर खड़ी मेरी मां,
फिर चाय पीकर जकड़न गई थी सारी छूट,
वो अपनी करुणा की प्याली से जो लाई थी घूंट!
अतीत का दबाव,
बीती बातों से भले भीतर प्रज्ञा रूठी थी,
किन्तु कुंठित मन को कब कहां कुछ सूझी थी?
क्या फिर मुमकिन वास्तविकता में बातें रूहानी?
कल चिट्ठी खोली तो छलक गया था आंखो से पानी!
किस पर हो रहा था प्रभाव?
दरअसल, कह रही थी छोटी पढ़ाई में ज़रा परेशानी,
कैसे सबको समझाए उसे पढ़ने हेतु ज़रूरी रौशनी,
छोटी की दुआ किंतु परमात्मा ने कबूली थी,
तभी तो अफ़सर बनने मिली उसे मंजूरी थी!
मेहनत से लगाव,
तभी लगन के बाद पूरी लगती अधूरी पुरानी चिट्ठी,
एकाग्रता से लक्ष्यपूर्ति संभव करने की शक्ति हुई इकठ्ठी!
फिर अरसों बाद निष्ठा से लिखी चिट्ठी सम्मुख आई,
जज़्बे की स्फूर्ति मेरी 'छोटी' को बड़ा अफ़सर बनाई।
- यति
You'll achieve!
❤️


