आकांक्षा के रहते हुए थे हम थोड़े गुमशुदा,
लग रहा था मन में वहम ना पनपे नया,
रिश्तों की कद्र तो होती हर लेखक में अलहदा,
अधिकार तो उद्धार करता अपनों संग होने में फना,
भूल खुदको भी बिना,साथ स्वर्ग बसाने की सीखनी कला,
तृप्त आध्यात्म से जिज्ञासा हुई सदा,
उच्च विचारो की उनके पास मानो पूरी संपदा,
लक्षण तो हमारे भी प्रेम से रौशन जगमगाने के,
थोड़ी तो हास्य में हमने भी पाई उपलब्धियां!
गिना गिना हम दोनों के गुणों की शक्तियां,
न करना खामियों से नज़रे चुराने की गुस्ताखियां,
समझ जो आएंगी तभी तो सुधर पाएंगी,
दोषहीन होने की जद्दोजहद में ही तो पार हो जाती कश्तियां,
आकांक्षा और अधिकार संग रिश्तों में संधारण होती प्रतिष्ठा,
जीवन के सौंदर्य में साहित्य संग रेखित होगी पराकाष्ठा।
- यति


