आहिस्ता से अपने पैतृक स्थान को चलें,
अपने जीवन के जहां सारे क्लेश मिटें,
जहां मंजूर हैं सूनापन रोज़,
किंतु प्रकृति की झंकार में होता गुंजन ज़रा तेज़!
वहां थोड़ा नदियों का पानी हैं मीठा,
नारियां लगाती हैं बालों में शिकाकाई और रीठा,
बगीचा बहुत घना हैं,
अंधेरा भी चांद की चांदनी से सना हैं,
दादीजी की कहानियां हैं आहिस्ता से नींद को बुलाएं,
सुबह मेरी नींद उनके भजनों के गान से खुल जाएं,
मिटता सारा ऐशो आराम का भ्रम,
सही चलता मस्त दिनचर्या की विधियों का क्रम,
प्रेरणा मिलती कैसे होता संतुलित समर्पण तथा श्रम,
दादीजी को मंत्रमुग्ध देख आंखे होती मेरी नम,
उनकी ममता के समक्ष हर उपाधि का महत्व हैं कम,
उनको आनंद में देख लगता जग में नहीं हैं कोई गम,
वो हर संध्या प्रकृति को निहारे,
हर सुबह मन से भगवान को सराहे,
एक लिफाफे में खत लिख दूं उनके नाम,
उनके त्याग को हैं मेरा सलाम,
अपनी वाणी को देना हैं बस यहीं विराम,
वो कविता पढ़ मुस्कुरा दें वही सबसे अनमोल इनाम।
- यति


