अधिकांश हिस्से,

लगभग मेरे हर किस्से,

वो कुछ अनुभूति देता यथार्थ,

जिसको नजरंदाज करने में नहीं कोई स्वार्थ,

थोड़ा सा खुद के नाम,

उस कला को करो सलाम,

वो जो देती हैं तुम्हारी हकीकत को नाम!

तुम्हें उसे देते तवज्जों मिलती खुशी सरेआम,

शायद खाना अच्छा बनाती हो!

हर ऑफिस की उलझन में समाधान निकाल लाती हो?

तो त्याग क्या करना हैं?

उस भ्रम का करो!

उस क्रम का करो जो काबिलियत होने के बावजूद खींचे तुम्हें,

उस आलस का करो जो व्यवस्थित न होने दे तुम्हें!

यकीन मुझे जग को तुम्हारे नेतृत्व की दरकार,

तुम्हारा स्वप्न हैं मिले सबको अवसर आपार,

मुनाफा हो पर आत्मीयता का ना हो व्यापार,

संयम की शक्ति तथा शोध तुम्हें स्वीकार,

मस्तिष्क में विचारों संग मन की सूक्ष्म ममता,

समर्पण से मैंने देखी नारी की उभरती क्षमता।


- यति