साक्षात अनुभूति हुई भीतर,
कहीं कोई बात तो है !
जो निखार लाएगी,
अगर व्यक्त हो पाएगी !
बदन में कष्ट मामूली है अब,
क्यूंकि हृदय में हुंकार भरी,
उसमें मन की शक्ति आपार भरी !
उसका सर्व के लिए होगा यही उपकार,
अभिव्यक्त कर सके उसे बस यही दरोकार !
आज़ादी हैं यहां, कुछ बुझली सी,
फिर भी उन्माद तो पनपेगा !
कल टूटी थी ,
रोई थी, तड़पी थी,
आज खुदको संभाले ,
औरो को हौसला देती ,
देखो ना मां के रूप में ,
बेहद मज़बूत सी सक्षम नारी खड़ी,
चार बरस पहले की थी ये बात,
कोई लेे चला था उसके सपनों को उजाड़,
उसकी हर फरियाद,
दिया तो उसे गहन अवसाद !
उस पर फिके थे एसिड के छींटे ,
झुंझल गए थे उसके ख्वाबों के फीते,
कोख में थी एक अबोध जान,
इस बात से था वो ज़ालिम अनजान,
आज ये बाला खुदके बल बूते गांव में शिक्षा देती है,
गांव का हर बच्चा उसके रूप नहीं,
जज़्बे का भी कायल है,
आज उसके स्वप्न नहीं घायल हैं ,
उसकी वाणी के माधुर्य से ,
उसकी खूबसूरती का परिचय होता !
उसकी ममता उसके रूप का सौंदर्य !
उसकी हंसी इतनी खिली सी की मानो,
मुरझाया गुलशन भी खिल उठे ,
अभिव्यक्त करने दे समाज !
तो शिक्षा से अंधेरा मिटना हैं !
साक्षात अनुभूति हुई जो भीतर,
यानी कहीं कोई बदलाव तो ज़रूर हैं।
- यति


