गया है दिल से मेरे इस जहां से परिंदा गिर गया है आसमां से
कोई घर को लेकर जा रहा है निकलते वक़्त आख़िर उस मकां से
अक्सर रात को होता है ये कि मैं पंखा घूरता हूँ इत्मिनां से
हटी दीवार से है कोई फ़ोटो सदाएं आरही है उस निशां से
बहाना ये कि रस्ता भूल बैठा मैं खाली हाथ लौटा हूँ दुकां से
बताया था कि दिल से कर रहा है मोहब्बत की मगर उसने ज़ुबां से
गुज़रना है सफ़र को रायगाँ ही करूँ फिर क्यूँ बहस मैं रायगाँ से
बता कर राज़ अपने राज़दाँ को मैं डरता हूँ मेरे ही राज़दाँ से
मैं अपने हाल पर रोता नहीं हूँ वगरना बात करता हूँ ख़िज़ाँ से


