मैं ढलते ढलते पीला हो जाता हूँ
और पीला...बहुत...
ये पीला मेरा रंग नहीं...मेरे दिन बीतने की पीढ़ा है...
"-- एक बून्द टपकती है क्षितिज पर पीली हल्की मथ्थम धुंधली सी रौशनी की...
और जब सागर के ढुलते छलकते पानी में, ये रिसती है तो ठंडी नीली शाम इसे थामती है, अपने में मिलाती है...
बलखाती है, गुनगुनाती है... उसे संभालती है और अगले दिन सुबह तक संजोती है।ठीक वैसे ही जैसे मैं थक कर घर आ
ता हूँ और तुम मुझसे लिपट जाती हो... --"
मैं शाम की नीली रौशनी में ठंडक महसूस करता हूँ...
- यशराज