जब जब भी बात की गई थी हमारे द्वारा, हमारे सुख की तो दुःख को तकलीफ हुआ करती थी कि वो अब ख़त्म हो जाएगा लुप्त हो जाएगा...या सुख में बदल जाएगा दुःख, जो लगातार कई बार हमारे अलग होने के बाद भी एक दूसरे से बात करने की वजह देता था वो दुःख अपने ख़त्म होने पर विरोध जताने लगा और बढ़ने लगा... पर हम ज़िद्दी हुए... न जाने कितनी बार हम ज़िद्दी हुए अपने सुख की बात करने के लिए अपने सुख को श्वांस देने के लिए... हमने हर खिड़की खोल दी... फिर लगातार ज़िद्दी होना खतरनाक साबित हुआ दुःख को खटकने लगा सुख... और उसने बढ़ने का फैसला किया हम फिर भी ज़िद्दी हुए...सुख के लिये उसके भविष्य के लिए और हमने हर खिड़की के साथ दरवाज़े भी खोल दिए अब उस आती श्वांस से साथ साथ सुख, दुःख भी लेने लगा था, दुःख सुख के भीतर घुस गया और उसका दम घोंटने लगा हम फिर भी ज़िद्दी हुए सुख के लिए और जब सुख को पूरी तरह, दुःख खा चुका था तब हम ज़िद की पराकाष्ठा पर थे इतने ज़िद्दी इतने ज़िद्दी कि हम उस सुख का दम घोंट कर बने हुए दुःख को ही सुख समझ कर कब दुःख जीने लगे...हमें पता ही नही चला... -यशराज