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सहसाः सहसाः आती है वह किंतु मुझे तनिक भी बोध नही ,
मै प्रफ्फुल्लित विचरता हँसता गाता गीत नृत्य उन तरंगों पर जो हवाओं से आती इतराती , मै अज्ञानी अनभिज्ञ ये तो माया है जिस फेर में तू मद में चूर गर्वित , गमन , अंतिम छोर वहीं जो आती हुई तुझे ले जाएगी तो ठहर उसके आने की प्रतिक्षा कर न कि अज्ञान भय वश मोचन की सोच !
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