मैं करता हूँ अपनी हर शाम,अपनी कविताओं के नाम,चाय के हर प्याले के साथ,मैं लिखता हूँ कोई नई गाथ,कलम पकड़ते ही,कागज़ पर उसे रगड़ते ही,मेरे सारे शब्दों का बन जाता एक नया संसार,जिसमें सीखने को मिलता मुझे कुछ नया हर बार।
मैं करता हूँ अपनी हर शाम,अपनी कविताओं के नाम,
चाय के हर प्याले के साथ,मैं लिखता हूँ कोई नई गाथ,
कलम पकड़ते ही,कागज़ पर उसे रगड़ते ही,
मेरे सारे शब्दों का बन जाता एक नया संसार,जिसमें सीखने को मिलता मुझे कुछ नया हर बार।