जब दिल की दुनिया नीरव सी, निर्जन गुमसुम सुनसान लगे,  तब उस सन्नाटे को चीरो, लफ़्ज़ों से शोर मचाकर तुम,  जब मन के भीतर भावों का, उमड़-घुमड़ कोलाहल हो,  कलम से उसको छलका दो, ख़ामोशी अपनाकर तुम,  जीवन की शोर-शांति में, खुद की आवाज़ न खो जाए,    इक मूक चीख से कहना, सब कागज़ पर ला लाकर तुम!!