पीले पड़े लिफ़ाफ़े में
एक मुड़ा तुड़ा ख़त आया है,
यादों के एक पोस्ट बॉक्स में,
ख़त ग़ालिब ने भिजवाया है,
आगाज़-ए-ख़त में यारों,
वह खूब ख़ैरियत कहता है,
फिर दिली इल्तज़ा कहने में भी
पीछे न वो रहता है,
ख़ैर ख़बर के बाद संदेशा,
कलम इश्क़ के नाम रहा,
हिज्र वस्ल कहने वालों के,
नाम ही वो पैग़ाम रहा,
इश्क़-विरह के पाक़ रूप को,
असदुल्लाह सदियों लिखता रहा,
उन हर्फ़ों की ताब में पर,
ये जहाँ भी अक्सर दिखता रहा,
सीरत-सूरत के दरमियां,
एक लक़ीर सी उसको दिखती थी,
और उस महीन फ़र्क को ही,
कलम-ए-मिर्ज़ा लिखती थी,
हाँ, इश्क़ दिमागी खलल लिखा,
पर नार नहीं बदशक्ल कही,
पूछा है मिर्ज़ा ने ख़त में,
क्या यही वो पाक़ इश्क़ नहीं??
जीस्त-ए-फ़क़ीरी नाम रही,
बेक़दरी भी सर-ए-आम रही,
ग़म फ़क़त वो खुद का कहता था,
फिर भी उसमें आवाम रही,
ग़मगीन ही स्याही रही मगर,
मुस्कानें रौशन करती थी,
हर नज़्म और हर एक ग़ज़ल,
दिल में राहत भरती थी,
तुम चाहे वस्ल उफ़ान लिखो,
या दर्द-ए-हिज्र तूफ़ान लिखो,
कोई आरिज़-ए-रुख़सार लिखो,
या घनी पीर हर बार लिखो,
ज़िंदा शख्स की वाह लिखो,
या मरे अक्स की आह लिखो,
जो भी लिखना, पर याद रहे,
न लिखना बस, कि लिखना है,
गाँठ बाँधकर धर लेना,
ये बात ज़हन में भर लेना
कलम, कागज़ पे जो भी कलाम लिखे
हर हर्फ़ में ज़िंदा सृजन दिखे,
हर हर्फ़ में ज़िंदा सृजन दिखे!