अपनों पर मर मिटने वालों,आज़ादी यूँ ही नहीं कमाई है,
उस सरहद पर जाने वाला भी, किसी का बेटा और भाई है,
ये ग़लत है, यहाँ कमी है,अक़्सर ये कह जाते हो,
बोलो उसे सही करने को, तुम क्या कुछ कर पाते हो?
नामुमकिन है शब्दों में,आज़ादी का मतलब कह जाना,
अहसासे करो तो जानो तुम, मुश्किल ग़ुलाम बन रह पाना,
हर छोटी सी बात में भी 'मेरी मर्ज़ी' कह जाते हो,
सोचो ग़र बातें भी हम 'अर्ज़ी' से कर पाते तो??
मुल्क़ की आज़ादी को आज,है सत्तरवां साल लगा,
तुम सोच ज़रा 'आज़ाद' रखो,ये युगों युगों आबाद रहे,
जीने से मर जाने तक हर दम मन में ये बात रहे,
मैं इस माटी से हूँ, मुझसे ये माटी शादाब रहे।