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शाम लिखने को खुद मचलती गई
और मेरी कलम भी चलती गई
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जाने कितने लिबास और बिस्तर
जिंदगी बेवजह बदलती गई
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उसने देखा चमन में हलचल थी
तितली उड़ती हुई संभलती गई
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मस्त भंवरे के इश्क में खुशबू
फूल से निकली और मचलती गई
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बात होठों से जो उतरी वो “विनय”
बात निकली जो घर से चलती गई
#writervinayazad

