✍️अजीज (आदर्श)✍️
वो अक्ल पे अपनी ही खुद ताले लिए हुए
उड़ने को चले पंख निराले लिए हुए
वो खुद की सोच से बढ़ा जो भी महान है
तुम नकल पर फिरते हो उछाले लिए हुए
किसका कोई आदर्श था जो भी महान है
आदर्श के किस्से में नकल का समान है
वो जिंदगी तो कब की तबाह हो चुकीं “विनय”
तुम रात दिन फिरते हो मिसालें लिए हुए
उनके लिए जीवन का अर्थ ही गुलाम है
बैठे हैं वो दिमाग में जाले लिए हुए
वो शाम की हवा ने .....
अब वो “विनय” दुश्मन से दुश्मनी का क्या गिला
बैठे हैं कुछ अजीज ही भाले लिए हुए
#writervinayazad

