बंद दिहाड़ी घर बैठे हैं कूचे, गलियां सब सुन्न हो गए। उदर रीते और आंख भरीं हैं कुछ घर इतने मजबूर हो गए। कहें आपदा या रण समय का, जिसमे स्वयं के चेहरे दूर हो गए। "घर" भरे हैं "रणभूमि" खाली मेल-मिलाप सब बन्द हो गए। घर का बेटी-बेटा दूर रुका है कई घर मे बिछड़े पास आ गए। हर घर में कई स्वाद बने हैं कई रिश्ते मीठे में तब्दील हो गए। बात हालातों की तुम समझो तुम्हारे लिए कुछ अपनों से दूर हो गए। जो है अपना वो पास खड़ा है। मन्दिर-मस्जिद आदि सब दूर हो गए। धैर्य रखो, बस ये है रण धैर्य का सशस्त्र बल बाले सब बर्बाद हो गए। है बलवान धैर्य स्वयं में अधैर्य केे बल पे सब हार गए।
-अतुल कुमार


