हाट भी बंद हैं गांव भी बंद हैं चलते-फिरते पांव भी बंद हैं। कहां जाऊं मैं भोजन करने, गुजरते दिन, रोजी-रोटी बंद है। आटा कम है राशन कम है हम जैसों को विकल्प भी कम हैं। कैसे बचेंगे इस महामारी में, हम जैसों को आश भी कम है। घर से बेघर कोई अपना बंद है वापस आतीं ट्रैन भी बंद हैं। हो सके तो भिजवा देना, घर से बेघर जो बाहर बंद हैं। बढ़ते दिन और हौंसले कम हैं अनुदान हेतु कागज भी कम हैं। महामारी में जान बचेगी? भूखे कैसे? भारत बंद है, स्त्रोत भी कम हैं। -अतुल कुमार


