मां
खामोश रहती है वह अक्सर
जब उसे दर्द होता है
एक मां ही है जिसके दुआवो में असर होता है
9 महीने जो खुद समझ कर किसी और को खुद में पनाह देती है
वो मां ही है जो
खुद को अनदेखा कर हमारी जिंदगी सवार देती है
कि क्या कहूं उनके लिए मैं अपने लफ्जों में
मां ही है जो मुझे इस झूठी दुनिया से बचा कर रखती है
की चोट लग जाती है उसे
जब मेरे आसू बहते है
अब क्या कहूं मै उनके बारे में
एक वही है जो अपने सीने से मुझे लगा कर रखती है
की दीपक है वो मेरी समा का
मुझमें उजाला भरती है
खुद काटो पर चल कर मुझे फूलो पर सुलाती है
हा वो मां ही है जो मुझे जीना सिखाती है
की मैं रैन हूं वो मेरी चांद है पूर्णिमा की
मुझे अपनी रौशनी से सजाती है
हा वो मेरी मां ही है जो मुझे जीना सिखाती है

