एक आह थी कुछ कर जाने की

थोड़ा जीने थोड़ा मर जाने की

की एक सपना था उड़ जाने का

थोड़ा वक्त थोड़ा बेवक्त खिलखिलाने का


क्या पता था की वो सपना 

बस एक आहट से टूट जाना था 

की लोगो का कहना अब तू बड़ा हो गया

ये खुशियां छिनने का बहाना था 


खिलखिलाना अब एक सौदा था 

जो जिंदगी से कर जाना था

वो ठोकर वो आसू

जो अब तक मिला मुझे 

की बस अब  उन घावों को सहलाना था


 कि सुबह हुआ था

 पर बस थोड़ा सा

 जब मैं छोटा बच्चा था

की शुरू हो गई धूप की वर्षा

 जब जवानी ने ठोकर खाई थी

 इतना शीघ्र शाम हो चला

 अब बुढ़ापा आई थी


क्या कहूं अब दुनिया को मैं

की खुशियां कैसे मिलती है

जिन चीजों को तुम खुशियां कहते

वो खुशियां की जग हंसाई है


खुश वही है जो खुद को

सच्चा राही समझता है

कोई आए कोई जाए जिंदगी से

पर वह तो बस चलता है

ठोकर को ही दोस्त बना कर

उनसे बाते करता है

वही जिंदगी का है मुसाफिर

 जो बस  चलता ही रहता है