माँ के एहसानों को शब्दो मे क्या बताएँ उसके अनमोल आँचल मे तो जमीं-आसमां भी ढक जाएँ।।   अक्सर खाते समय याद आते वो एहसास माँ खाकर रूखा-सूखा खिलाती थी मुझे जो हो खास।।   समाजरूपी पिंजरे मे हो न जाय चूर माँ ने ही सिखाये मुझे खुशहाली से जीने के गुर।।   मेरी ख्वाहिशें जानकर मेरे ख्वाबों को किया श्रृंगार अपनी ममता की छाया मे जिंदगी दी मेरी संवार।।   वसीम’ उसके एहसानों को यूं ही गर भूल जायेगा बताओ फिर मेरे जिने का क्या अर्थ रह पाएंगा।।