अब तो हादसों पर भी हंसी आती है
जिंदगी इस कदर क्यों आज़माती है
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औरों से करके ज़िक्र उनको बदनाम भी नहीं करता
अब तो हादसे की किसी को ख़बर भी नहीं करता
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इंसानों में इंसानियत अब कहां बाकी रही है
अब तो दहशत खुलेआम मुस्कुरा रही है
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अब तो रोज़ कत्ले-ए-आम होता है
क्या जिंदगी हमारी आम हो गई है
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ज़िंदा नज़र तो आते हैं मगर हकीकत में है नहीं
मुर्दों पे क्या मलाल करना जिंदा तो वो है नहीं
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सुकून ए नींद अब कहां मयस्सर है
मेरे हिस्से में एक रकीब आ गया है
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(वकी.के)

