सिंह वेद शस्त्र पर तिलक कर, लड़ने का उद्घोष करो
तुम गिरो,मगर वापस उठने का होश धरो
हैं नहीं ये सहज, स्वयं की विजय शिलायों पर विजय पाना
दूर दराज तकलीफों में खुद को उलझाए रख जाना
ज़ज्बातों से नहीं, हालतों से नहीं, ये लड़ाई तुम्हारी तुमसे हैं
तो उठो फिर, खुद का खुद को परिचय दो
तुम खुद को विजय दो, विजय दो
उठे हुए हैं कई आसमाँ दीदार में
कुछ और लोग भी हैं इंतजार में
जो काम तुमने छोड़े थे मझधार में
जो किस्से कहीं खो गए तकरार में
जींवत करो उन साहिलों हो
जिनका समंदर तुम लिए बैठे हो
वो लावा, निकालो बाहर,
जो अंदर लिए बैठे हो
तो उठो फिर, जय को अजेय दो
तुम खुद को विजय दो, विजय दो
पाषणों से भरे हुए रास्ते
टेड़े-मेड़े टूटे फूटे से रास्ते
तुम्हारे लिए बाहें फैलाकर
चुनौतियों का दामन सहलाकर
विरक्त हुए बैठे हैं, रिक्त हुए बैठे हैं
अपने पद् चिन्हों से, उनका जरा अभिषेक करो
कुटील, कंटक, कंलकित विचारों का निषेध करो
कुछ काम तुम विशेष करो, विशेष करो
खत्म न हो कहीं, ऐसा कोई मय दो
तुम खुद को विजय दो, विजय दो