" मैं स्वतंत्र हूँ", तुम कहते हों.. और, कपड़े भी अपनी पसंद के लेते हों..!!   मैं इंतज़ार करती हूँ, मेरी पसंद तुम्हारी होने का.. और, तुम अपने हक़ की बात कहते हों..!!   स्त्री स्वतंत्र हुई मैंने माना.. फिर भी पुरुष का सन्निन्ध चाहती हैं.. पुरुष उससे स्नेह करता भले, परतंत्र करता कहीं न कहीं..!!   स्नेह हों या दबाव, स्त्री झुकती हैं सदैव अपनों के आगे.. फिर कैसे हुई वो 'स्वतंत्र' भला??   मैं बेशक़ तुम्हें चाहती हूँ, पर चाहती हूँ, तुम भी मुझे स्वतंत्र करो.. मैं मर्ज़ी से जी सकूँ..  बिना किसी को कोई सफाई दिये..   तब होंगी मैं स्वतंत्र.. तब होंगी स्त्रियाँ स्वतंत्र..!!