चकाचौंध से रौशन हो चली हैं 'शहर की गलियाँ'
फ़ीकी हो गई मिट्टी की सौंधी खुशबू
सुनी हो चली हैं 'गाँवों की गलियाँ..।'
छोड़-छाड़ के घर-बार अपना
छोड़ पुराने सखाओं की टोलियाँ..
पुरानी यादों को पुरानी गलियों में छोड़
जीने चल देते हैं 'कितने' ही नई खुशियाँ..।
गलियाँ जो कभी गूंजती थी यारों के ठहाकों से
आज पसरी रहती हैं वहाँ वीरानियाँ..
घुमक्कड़ी करते थे दोपहर में भी
शामों को याद आती हैं वो बिछड़ी यारियाँ..।
शहर की गलियाँ भी अपनी सी लगती हैं..
फिर भी यादों के झरोखें में तो
आज भी महकती हैं गाँवों की क्यारियाँ..।