शेष अभिलाषाओं के भंवर में पड़ कर, बहुतों के परिवार बर्बाद होते गये..।   बिखरता गया गृहस्थ जीवन, बहुतों ने ढूंढा कहीं और प्रेम, और रिश्तों को तिलांजलि देते गये..।   अतृप्त इच्छाओं की संतुष्टि भर रह गया हैं प्रेम, विकल्प तलाशते हैं लोग.. प्रेम का भी..!   सही-गलत के मायने बदल चुके हैं, जो मन को लुभाये, वही संगी प्रेम का ही..!!