गुंजाइश कहाँ??
उरियां पलों में जान लाना..
तुझ बिन जी सकूँ,
इब्रत सा लगता हैं..!!
ख्वाहिशों में तिरी हुकूमत रही,
ख़तरा अब खुद से लगता हैं..!!
गुंजाइश कहाँ??
खुदा से नाराज़ हो पाना..
बिन तिरे हर कोई,
ख़फ़ा सा लगता हैं..!!
जमानत करा भी दो मिरी,
गैहान जैसे कारागार लगता हैं..!!
गुंजाइश कहाँ??
जुदा तुझसे हो पाना..
ज़र्ब भी तिरे संग,
नाउम्मीद सा लगता हैं..!!
नदीदा ये दिल बड़ा होने लगा,
इश्क़ बे-अन्दाजा भी थोड़ा लगता हैं..!!
गुंजाइश कहाँ??
फ़साना लिख पाना..
इश्क़ लेकिन अब,
मिरा आसरा लगता हैं..!!
तसल्ली बस इस बात की रही,
मुझमें वो हर-सू मिरा लगता हैं..!!


