कैसे घर को टुकड़ों में काट लेते हैं, कुछ लोग तो माँ-बाप को बाँट लेते हैं।   परवरिश में उनकी कोई कमी नहीं छोड़ी होगी, फिर क्यों? भाई भाई, बहन बहन को छोड़, नये रिश्तों से अब हालात कहते हैं।   मोल अब कागज़ के टुकड़ों का ज्यादा हैं, इन टुकड़ों के आगे.. अपनों का पलड़ा हल्का हो गया.. तोहफ़े भी पैसों से तोले जाते, ये कैसी दिशा की ओर हम आगे बढ़ते हैं।   कमजोर जिनकी हड्डियाँ हैं, उनका सहारा बनो, अपनों से ही जीवन हैं, उनसे न किनारा करो।   मत बटवारा करो अपने अपनों का, तिनका-तिनका जोड़ के.. महल बनाया होगा उन्होंने सपनों का।   हैं खुशियाँ वहीं जहाँ सब साथ होते हैं, फिर कैसे कुछ लोग माँ-बाप को बाँट लेते हैं??