अबके सावन में वो पहले वाली बात नहीं,
मुद्दतों से उनसे हो सकी कोई मुलाक़ात नहीं।
इत्तिफ़ाक़ था उनका चौखट पे मेरी आना,
क़ल्ब समझ सका उनके कोई ज़ज़्बात नहीं।
ख़बर फ़ैल गई फ़िज़ाओं में भी इस क़दर,
'इश्क़' ही हुआ होगा चाहे कोई इस्बात नहीं।
मैंने ख़ैर गुलिस्तां को उनके लिए सजाया,
गुस्ताख़ी थी रख सकी कोई एहतियात नहीं।
जुर्माना लगा दो 'इश्क़' की जुम्बिश के लिए,
मैं समझ सकी जाने क्यूँ अपनी औक़ात नहीं।
ज़ाहिल हूँ मैं अपनी और उनकी नज़रों में,
बाँट सकी उनसे अपने कोई खयालात नहीं।
शब्दार्थ:
क़ल्ब= दिल, मन, बुद्धि,आत्मा
इस्बात= साक्ष्य
एहतियात= सावधानी
जुम्बिश= हरकत