साथ चल रहे हैं पर, 'साथ' नहीं हम, अजनबी ही तो हैं हम..!   भीड़ का हिस्सा मैं भी, भीड़ का हिस्सा तुम भी... भीड़ में मिलकर, भीड़ में विलय..! क्यों ढूंढते रहें फिर अब? अजनबी ही तो हैं हम..!   दो पल रुक कर राह में, दो बातें कर ली हमने... फिर दो रास्तों में बँट गये हम... देंगे भी कैसे आवाज़ अब? अजनबी ही तो हैं हम..!   कितना अच्छा होता जो थोड़ा सा और जान जाते हम... थोड़ी सी और बातें कर जातें... फिर मिलते कभी, तो ये ना कहते- 'अजनबी ही तो हैं हम...!!'