अब मैं अपने मंजिल के करीब था, लक्ष्य मुझसे दूर था अब उतना ही जिसे पाने में हिम्मत कम ना हो, दूर किसी बस्ती से मदद की गुहार आई! मुझे उस आवाज ने भ्रमित नहीं किया! लेकिन मैं आवाजों का खोजकर्ता दुख दर्द दूसरों का खुद में बांटने के लिए जंगल के बीच दरमियां तलाश करता हुआ चल पड़ा नए गंतव्य तक पहुंचने के लिए मेरे सर पर ख्वाबों की गठरी का बोझ था मेरी आंखों में उम्मीदों की सूजन थी मेरे हाथ अधूरे वादों का भ्रम रखते हुए मेरे पैरों को जकड़े हुए थे मेरी किस्मत मेरे मुस्तकबिल के ख्वाब बुनने जा रही थी अभी वक्त पूरा होने में वक्त बाकी था लम्हों की मुसाफत सदियों में बदलती गई मगर आवाज़ कहीं दूर जंगलों में भटकती हुई करीब सी आती गई, मेरे करीब इतना करीब कि सांसें इन आवाजों से बोझल थी माथे पर शिकन आई, नशे कमजोर पड़ने लगी हौसलों ने उम्मीद का सहारा लिया और मुझे आगे बढ़ते रहने के लिए कहा क्योंकि अभी मैं हारा नहीं था, और अब भी मैं हारा नहीं हूं। मैं पहुंचूंगा अपने लक्ष्य तक क्योंकि मैं मंजिल के करीब था, और, अब और भी करीब हूं।