तेरी जुदाई में

छलक जाती है शराब प्यालों से,

लबों तक आते आते

निकल जाते हैं आंसू आंखों से,

मिलन की शाम आते आते

तड़पाया है ज़माने ने इस क़दर

हंसना ही भूल गए हैं,

ठोकरें खाते खाते

लौट जाती हैं बहारें,

दरवाजे पे आके

गुजर जाती है रातें

तेरे ख्वाब दिखा दिखा के

अपने दर्द का अफसाना क्या लिखें

कलम भी टूट जाती है

अंजाम तक आते आते

प्यासे हैं तेरे दीदार के

वापस जाना अबके के

मर ही जायेंगे तेरी जुदाई में

परिंदे से तड़फड़ाके।

प्रस्तुति - वीरेन्द्र जैन