खुशियां

 

खुशी के दो पल, जो भुला देँ बरसों के गम

उनकी तलाश मे, मरा जा रहा हूँ

कहाँ है वो मलहम, जो भरदे हर जख्म

जिसकी चाह मे, ठगा जा रहा हूँ

उदासियाँ दरख्तों पर चढ गयीं हैं

खामोशियाँ धुआं बन फिजा में घुल गई हैं।

हवाँए जख्मों को हरा कर जाती हैं

मैं खुशियों के पीछे भागता हूँ

वो और तेज भागती हैं

मेरी पकड से बाहर

मैं अब थका जा रहा हूँ

खुशियों की तलाश मे मरा जा रहा हूँ।

 

प्रस्तुति - वीरेन्द्र जैन