तुम और मैं
तुम वर्षा सी, मीठी फुहारों सी,
तुम फूलों सी तुम बहारों सी,
मैं रौद्र अनल कोलाहल सा,
मैं ऋक्ष मैं शापित मरुथल सा,
तुम तेजस, ओजस, निर्झर सी,
मैं सुप्त, मैं अविचल गिरिवर सा,
तुम बहती हुइ एक नदिया सी,
मैं ठहरे मट-मैले भूजल सा,
पर अब भी मुझे क्यों लगता है,
तुमसे मुझमें है कुछ जीवन सा।
Vikram...


