संग्राम... 


न जाँच इस भुजंग का गरल,

न नाप किसी समुद्र का तरल,

क्या देखा है कोई समर सरल,

तू हो युध्द रत विद्रोह कर।


कोई स्वार्थ कहीं न निहित हो,

कोई शोक कहीं न विदित हो,

यह संग्राम है तो संग्राम जी,

अब हो युध्द रत विद्रोह कर। 


तू सभी देवताओं की आस है,

तू पूरी स्रूष्टि का प्रयास है,

यह न सोच तू अनायास है,

तो हो युध्द रत विद्रोह कर। 


है विषमताएँ बस हाहाकार है,

अब जन-जन की यही पुकार है,

बस तू ही मानवता का उद्धार है,

तो अब हो युध्द रत विद्रोह कर।

Vikram...