मेरे रिश्ते मुझही से मेरी पहचान माँगते हैं,
जो कबका खो गया है वो इन्सान माँगते हैं।
मेरे पैरों तले की मुझसे ज़मीन माँगते है,
वो मेरी छत और मेरा आसमान माँगते हैं।
वो करके टुकड़े-टुकड़े मेरी ही आबरू के,
मैं फिर भी चुप रहूंगा ये ज़बान माँगते हैं।
Vikram...
