मैं अपने इश्क से गमख्वार हूं पर शर्मिंदा नहीं हूं,

मैं तो तेरे शहर का मुसाफिर था बाशिंदा नहीं हूं।


तु मुझे बांध अपने जुड़े में रख सकती है तो रख लें,

हां पर मैं घोंसलों में रहनेवाला कोई परिंदा नहीं हूं।


मैं अंधेरा हूं अंधेरा और मुझे इसका गम भी नहीं है,

मैं आफताब हुआ करता था अब रख्शंदा नहीं हुं।


मैं जो हूं मुझे उसका फख्र है मैं दिखावा नहीं करता,

मैं खुद में सच हुं पुरा सच, मैं झुठ का पुलिंदा नहीं हुं।


अब तो मेरी मौत ही मेरे नाम को रौशन करेगी शायद,

अभी मैं गर्दीश का सितारा हूं,अभी ताबिंदा नहीं हुं।


Vikram...