कोहर...
कभी शफ़क़ कभी कोहर में रहा,
मैं सफर का था मैं सफर में रहा।
तुम सुकुँ के थे, शाम-औ-सहर में रहे,
मैं कड़ी धूप का था मैं भरी दोपहर रहा।
मैं सुखनवर था सुखन के निजाम में रहा,
गज़ल के उनवान में रहा शेर के बहर में रहा।
उसी के घर में भी उसी के कहर में रहा,
मैं दैरो-हरम में दुआ-ए-बेअसर में रहा।
Vikram...
कोहर-Fog शफ़क़- उजाला
बहर-Meter of poetry उनवान-शीर्षक

