जाने भी दो....
झिलमिल झिलमिल तेरी परछाई,
आ चुकी है ख्वाबों में,
सौंधी सौंधी तेरे इत्र की खुश्बू,
छा चुकी है सांसो में,
खुद को कितना समझया,
तेरी यादों में नहीं खोएंगे हम,
चलो जाने भी दो आज रात,
फिर से नहीं सोएंगे हम।
मेरे आँगन में खिलती तुम
जैसे तुलसी की क्यारी थी,
तुम चाँद बनी थी क्यूँ मेरा
जब रात बहुत अँधियारी थी,
अब तेरे उन एहसासों को
अपनी यादों में कैसे बोएंगे हम,
चलो जाने भी दो आज रात,
फिर से नहीं सोएंगे हम।
तुमसे क्या बिछड़ा,
मुझसे जैसे जीने का बहाना छुट गया,
तुम मुझसे क्या रुठे,
मुझसे जैसे सारा ज़माना रुठ गया,
ख्वाब सजाया था जो मिलके,
वो ख्वाब सुहाना टूट गया,
अब उन यादों को, उन ख्वाबों को
अपनी आँखों में नहीं पिरोएँगे हम।
चलो जाने भी दो आज रात,
फिर से नहीं सोएंगे हम।
Vikram....


