हकीकत में...
मेरे खुँ की तरह मेरी इन रंगों में दौड़ता है तू,
कहने को छोड़ दिया, हकीकत में कहाँ छोड़ता है तू,
मैं तो अब मेरे ख़्वाबों में भी तेरा राब्ता नहीं चाहता,
तू मेरे जहन में रहता है, कतरा-कतरा निचोड़ता है तू।
संभाले हुए गम के सैलाब को मैं एक ज़रज़र दीवार सा हूँ,
तू एक दरिया सा है, हर साँस मुझे ज़रा और तोड़ता है तू।
बड़ी-बड़ी वादीयाँ उकेर देता है तु मेरे सीने को चीरकर,
फिर कहीं-कहीं किसी पुल की तरह उन्हें जोड़ता है तू।
Vikram...

