बारिश... 


जीवन पथ पर कड़ी धूप से,

हों प्रबल कई प्रशनार्थ बड़े।

रिश्तों के दरवाज़ों पर हों,

सुखे सहेराओं से स्वार्थ खड़े। 


    मैं मिट्टी की सौंधी सौंधी,

     खुश्बु फिर से लाऊँगा। 


   मैं बारिश बनकर आऊँगा,  

पहेली बारिश बनकर आऊँगा।


कितनी साँस रुँध जाती हैं,

भावों के मंथन-मंचन में

जीवन पथ पर थक जाती है, 

रिश्तों के गठबंधन में 

  

   तुम हार न जाना इस पथ पर,

   मैं आकर आशादिप जलाउँगा।


    मैं बारिश बनकर आऊँगा,  

पहेली बारिश बनकर आऊँगा।

Vikram...