देखता हूँ जब-जब आसमां में,
उन घुप्प-घने बादलों में चित्रित,
स्याह चेहरा नज़र आता है।
पल-पल बदलता मिज़ाज़ वो,
कभी इंसान तो, कभी शैतान,
तो कभी अनजान नज़र आता है।
गिरगिट सी दुनिया का,
छुपा हुआ अनदेखा-अतरंगी,
हर-एक पहलू नज़र आता है।
कभी देखिए ज़रा गौर से तो,
उसमें जिंदगी की किताब का,
हर पन्ना पाक-साफ़ नज़र आता है।