अरे!बताओ कब बोलोगे?

अपनी होगी तब बोलोगे?

कब तक वहशी हैवानों को,

जाति के पलड़े पर तोलोगे?

अरे!बताओ कब बोलोगे?

कब तक नोचेंगे ये गिद्ध दरिंदे,

माँ केे आंचल की बगिया को?

कब तक देखेगा बाप बेचारा,

रात में जलती अपनी बिटिया को?

बंद मुंहों को कब खोलोगे?

अरे!बताओ कब बोलोगे?

कब तक हर बिटिया को देश में, 

डर-डर कर जीना होगा?

कब तक इस अभिशप्त ज़हर को, 

घुट-घुट कर पीना होगा?

बंद नयन कब खोलोगे? 

अरे! बताओ कब बोलोगे?

       - विवेक कुमार सिंह