तुम हो तो भद्दे, काले, टेड़े, मेड़े दिखने वाले,
शब्दों में जादू बरक़रार है,
तुम हो तो समुद्र के खारे पानी में भी,
अजीब सी मिठास है,
तुम हो तो इश्क में ‘नमक’ है,
तुम हो तो अंधे कुए में ‘चमक’ है,
तुम हो तो सिगरेट सा ‘जलता’ हूँ मैं,
तुम हो तो ‘चप्पा चप्पा’ चरखे सा चलता हूँ मैं,
तुम हो तो दिन करवट लेता है,रात थम जाती है,
लिपटो तो ‘लोहे के चिमटे’ से मार भी पड़ जाती है,
तुम हो तो मैं कभी चाँद का ‘टीका’ बना लेता हूँ,
तो कभी चाँद के साबुन से नहा लेता हूँ,
कभी ज़िन्दगी से नाराज़ हूँ, तो कभी उससे शिकवा ही नहीं,
तुम हो तो कितनी आसान है ज़िन्दगी,
तुम हो तो जीना-वीना इजी नहीं,
शुक्रिया तुम्हारे होने के लिए,
शुक्रिया गुलज़ार साहब कि तुम हो...
विवेक जैन


